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Tuesday, June 15, 2021
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श्रीमद्भागवत गीता की रोचक कथाएं

 मन  को कैसे स्थिर करें?

श्री कृष्ण:- हे पार्थ इस संसार में सभी चीजें नश्वर है  सिर्फ जीवात्मा को छोड़कर यह सब जानते हुए भी पार्थ मनुष्य मोह माया के जाल में ऐसा उलझ जाता है जैसे उसे कुछ सूझ ही नहीं होती। वासना  मे लिंन क्रूर कर्म करता है।
 हे अर्जुन यदि तुम धीर मति वाले हो और दृढ़ निश्चय वाले हो तो यही काम सरल है।
और यदि तुम्हारी मति धीर नहीं है तो दृढ़ निश्चय नहीं कर सकोगे
तो जन्म जन्मांतर तक भटकते रहोगे
अर्जुन कहते हैं:- हे मधुसूदन दृढ़ निश्चय कैसे हो सकता है
श्री कृष्ण कहते हैं: परमात्मा में विश्वास से सत्य में   धर्म में विश्वास से तुम्हारा दृढ़ निश्चय हो सकता है| फिर तुम सुख-दुख हानि लाभ जय पराजय को एक जैसा समझ कर अपने पद से  डगमगओगे नहीं।
 हे अर्जुन  तुम शिष्य बन कर मेरी शरण में  आए हो इसलिए मैंने तुम्हें धर्म योग और कर्मयोग की शिक्षा दी है।  अब मैं तुम्हें कर्म योग के विश्व में वह पूर्ण विधि बताऊंगा | जिसके द्वारा तू कर्म करता भी कर्म  के बंधनों से मुक्त रहेगा|

 श्रीमद्भागवत गीता के तीसरे अध्याय 36 में श्लोक में

अर्जुन कहते हैं:- हे वासुदेव मनुष्य कई बार नहीं चाहते हुए भी पाप कर्म के प्रेरित हो जाता है|

 ऐसा लगता है कि कोई बलपूर्वक उससे यह सब करवा रहा है ऐसा क्यों वासुदेव?
फिर भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:– हे कुंती पुत्र मनुष्य की कामनाएं उसके ज्ञान को ठग देने का उसे दबा देने का कार्य करती है।
जिसके चलते हम ना चाहते हुए भी गलत कार्य कर बैठते हैं क्योंकि कामनाओं की अग्नि कैसी अग्नि होती है जिसे जितना भी बुझाने की कोशिश की जाए उतना ही बढ़ती है|
 कामना यानी हर वह चीज हर वह चाह हर वह वस्तु जो हमारे लक्ष्य और हमारे उद्देश्य भटका देती है।
हे अर्जुन यह काम ना इतनी बलशाली और इतनी बुद्धिमान होती है कि हम ना चाहते हुए भी अपने लक्ष्य से भटक ही जाते हैं|
अर्जुन कहते हैं:- शिव वासुदेव से छुटकारा कैसे पाया जाए?
 
श्री कृष्ण कहते हैं:– हे अर्जुन इंद्रियां मन और बुद्धि इस कामवासना का निवास स्थल है। अगर इन तीनों पर विजय प्राप्त नहीं की तो यह मनुष्य को सब जगह से बरबाद कर देती है।
श्री कृष्ण कहते हैं हमारे अंदर चल रही है उधर पीतल का कारण हमारे अंदर ही  निहित है हमारे मन बुद्धि और इंद्रियों में ही मौजूद होता है।
 समाधान हमारे अंदर ही है।
फिर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कथा सुनाते हैं
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:- हे अर्जुन मन है शरीर के रथ का सारथी  रथ को चाहे जिधर ले जाए इंद्रिया है इस  रथ के घोड़े मन  को विषयों की ओर भगाए आत्मा और शरीर के मध्य में यह मन अपने खेल दिखाए|
 हे अर्जुन मन को वश में कर ले जो योगी वह इसी रथ से मोक्ष को जाए ।
हे अर्जुन मन मनुष्य ऐसा दुश्मन है जो विषयों की और    भटकाता है| मन से बड़ा भैरूपीना कोई पल-पल वृक्ष का स्वांग निराले माया ममता में उलझा रहे जो पड़ जाए जो मन के पाले  हे अर्जुन मन के बहकावे में ना क्योंकि मन राह बुलाए भ्रम में डालें तू इस मन का दास ना बन  इस मन को अपना दास बना ले।

आत्मा का ज्ञान?

अर्जुन कहते हैं :- हे मधुसूदन आत्मा और शरीर में क्या अंतर है आत्मा क्या है?
भगवान कृष्ण कहते हैं:– हे महाबाहो  आत्मा आदमी है आत्मा ना तो जन्म लेती है ना मरती है क्योंकि आत्मा परमपिता परमेश्वर का ही अंश होती है। इस मनुष्य शरीर को चलाने वाली भी जीवात्मा ही होती है।
अर्जुन कहते हैं:- फिर मधुसूदन मृत्यु किसकी होती है अगर शरीर मर जाता है तो आत्मा भी मर जाती होगी।
भगवान श्री कृष्ण  कहते हैं:- दुख सुख लाभ हानि यह सब शरीर के सुख होते हैं आत्मा के नहीं और जो  मरता है वह मनुष्य का शरीर होता है आत्मा ना तो जन्म लेती है ना मरती है शरीर से निकलते ही आत्मा।
मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मों का कच्चा चिट्ठा लेकर अपने कर्म अनुसार पुण्य आत्माएं स्वर्ग लोक में निवास करती है और  और बुरे कर्म करने वाली आत्मा नीच योनि तथा नर ग्रुप में अपने कर्मों का फल भुगतनी है।
 इसलिए मधुसूदन कर्म करो फल की चिंता मत करो फल देने वाला  ईश्वर है|
 
अर्जुन कहते हैं:-  हे मधुसूदन अगर पुण्य आत्मा स्वर्ग लोक में जाती है तो वह स्वयं अच्छे कर्म ही करती होगी वहां।
श्री कृष्ण कहते हैं:– नहीं अर्जुन बल्कि स्वर्ग लोक में जाने वाली पुण्य आत्माएं उनका भोग भोग रही है वहां क्योंकि उन्होंने जितने अच्छे कर्म करें हैं वहां वह उतना भोग भोग रही है| और जब उसकी भोगों की और पुण्य की समाप्ति हो जाती है तब वह फिर से इस पृथ्वी लोक यानी कर्म लोक में जन्म लेती है|
 फिर अर्जुन कहते हैं:- हे मधुसूदन ऐसी कौन सी जगह है जहां से परम आनंद की प्राप्ति होती है जहां से मनुष्य की जीवात्मा फिर इस कर्म लोक में जन्म नहीं लेती है परम आनंद को प्राप्त होती है ऐसी कौन सी जगह है मधुसूदन|
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:- हे मधुसूदन वह मोक्ष का मार्ग है जहां से मनुष्य की जीवात्मा फिर कभी जन्म नहीं लेती है वह मेरा धाम है बैकुंठ धाम| पृथ्वी लोक में जन्म लेने  वाले मनुष्य का लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति और मनुष्य मन किमाया में ऐसा उलझ जाता है कि वह अपने लक्ष्य को ही भूल जाता है| हे मधुसूदन मनुष्य शरीर ऐसे ही किसी को नहीं मिलता है फातिमा के पूर्व जन्म के कर्मों से उसे इस मनुष्य शरीर की प्राप्ति होती है| इसीलिए यह  अफसर गवाना नहीं चाहिए क्योंकि अगर वह यह अवसर गंवा देगा तो जन्म जन्मांतर के चक्र में ऐसा फंस जाएगा कि फिर मोक्ष की प्राप्ति उसे कभी नहीं होगी वह इस लोक से उस  लोक से इस लोक में भ्रमण करता फिर आएगा|
अर्जुन पूछते हैं:- हे वासुदेव  ऐसी कौन सी विद्या है जहां से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
श्री कृष्ण कहते हैं :-योग विद्या से अगर मनुष्य उसकी आखरी सांस तक मुझे याद करेगा वह मेरे चरणों में आ गिरेगा और उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ेगा उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी।

श्रद्धा और विश्वास का होना?

मनुष्य के जीवन में श्रद्धा और विश्वास का बहुत बड़ा महत्व है श्रद्धा और विश्वास से मनुष्य अपने कर्म करेगा भगवान को अर्पित कर कर तो वह जिंदगी भर प्रसन्न रहेगा भागवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं अर्जुन से⬇⬇
श्रद्धा  बिन विनय और विनम्रता ना आए पार्थ श्रद्धा विहीन प्राणी एवं लिए जलता श्रद्धा के गर्भ से लेता विश्वास जनम विश्वासी ह्रदय तर्क जाल से निकलता श्रद्धा से निष्ठा और निष्ठा से एक निष्ठ एक निष्ठ बिना नहीं काम नहीं चलता| श्रद्धा बिन प्रेम नहीं भक्ति नहीं प्रेम दिन के श्रद्धा ही दिलाए  ईश प्राप्ति में सफलता|
जब तक रेन पर अहम का डेरा तब तक मैं देता ना दिखाएं जिसके मन से मैं नहीं निकली उसने मेरी कृपा नहीं पाई मुझे समर्पण के भाव प्यारे हे नाथ नारायण वासुदेवा|
आज की जीवनशैली में मनुष्य भगवान से ज्यादा खुद पर विश्वास करता है। क्योंकि इस युग में मनुष्य को लगता है कि उसका कोई है ही नहीं इसलिए वह भगवान पर विश्वास ही नहीं करता जिस तरह श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता में यह ज्ञान बांटा था कि श्रद्धा और विश्वास एक बहुत बड़ी चीज है अर्जुन| इसमें मेरी कृपा सदैव तुम पर बनी रहेगी लेकिन आज के लोग भगवान को मानना ही बंद कर दिए हैं क्योंकि वह समझते हैं कि जो सत्य नहीं वह सत्य नहीं जो दिखाई नहीं देता उसे भगवान कैसे माने।
यह सरासर गलत है भगवान की लीला ना तो हम   तुच्छ मनुष्य समझ सकते हैं और ना ही जान सकते हैं| हमें लगता है हम मनुष्य बहुत महान है लेकिन हमें यह नहीं दिखता कि अपने ऊपर भी महान शक्तियां हैं जिसे हम ईश्वर कहते हैं। श्री कृष्ण ने कहा था गीता में  तुम मुझे हर जगह पाओगे तुम्हारे माता-पिता में इस धरती में फूल में किसी भी वस्तु में तुम मुझे पाओगे लेकिन उसके लिए तुम्हारा मन साफ होना चाहिए तुम्हे श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए और अगर विश्वास और श्रद्धा का डेरा तुम पर बना रहेगा तब तक तुम मुझे कभी नहीं देख सकते |क्योंकि मैं यह मानता हूं कि बॉके बिहारी के बाल के बराबर भी नहीं है दुनिया।

योग की परिभाषा?

हमारे भारत के शास्त्रों में योग को बहुत बड़ी परिभाषा कही गई है मन को एकाग्र और एकांता में  रहने को योग की परिभाषा की गई है| किस विद्या से पांचों इंद्रियों को और शरीर को वश में किया जा सकता है भागवत गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं|

त्याग दे तू आ सकती धनंजय कर्मों में  रथ रहे जैसे योगी  शक्ति आसकती में   राख समत्व के लाभा  और हानि का वंन सम होगी योग की परिभाषा है समत्व है फिरता में योग परम उपयोगी|

विजय पराजय और जान समान में तभी तेरी योग में परिणीति होगी।

एकांत में  समय व्यतीत करने  में और भगवान को याद करने से मन की शुद्धि होती है और मन की शुद्धि से ही ध्यान लगाने की विद्या प्राप्ति होती है|

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